एक सुनहरा दिन

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स्वतंत्र भारत के पहले दिन की पहली सुबह का विवरण

 

नयी प्रभात का वह पहला सूरज

चमक रहा था एक नए ढंग से ।

डूबी आशाओं की किरणे लेकर

उदय हुआ हर इच्छाएं जगाकर  |

जी उठी थी फिर गंगा

निर्मल जल बहाते हुए |

झुकी हुई हिमालय की चोटियां

खड़ी हो गयी फिर सिर उठाये |

ख़ुशी के गीत गाते हुए

चहक रहे थे साथ परिंदे |

गूँज रहा था हर एक वन

पशुओं की आवाज़ों से |

जब पड़ी वर्षा की

वह पहली सुखमय बूँद,

चारों ओर लहर उठी

बंजर भूमियों पर लहराली |

नवीन पत्तियां पेड़-पौधे लेकर

झूम रही थी धरती सारी |

जब छायी दूर लालिमा

सांझ के सूरज की ,

संगम हुआ जोश-बल का

जन- जन के दिलों की |

जब छा गया नीला गगन

श्वेत-श्वेत बादलों से,

शांति का पैगाम लिए

स्थिरता थी वातावरण में |

चमक रही थी हरी-भरी धरती

नीचे किसानों की हरियाली लेकर,

कर रही थी उदरपूर्ति

लाखों करोड़ो लोगों की |

बटोर रहा था पवन

शहीदों की स्मृतियाँ कण-कण में |

अपनी धीमी गति से

पंहुचा रहा था गर्व का सन्देश |

प्रसन्नता की बहार लिए

दिखा रही थी अपना करिश्मा कुदरत |

टूट गयी बेड़ियाँ भारत माँ की

जब कहलाया गया

एक स्वतंत्र भारत |

 

 

मैं हूँ एक मज़दूर

मैं हूँ एक मज़दूर

जिसकी है अनोखी गाथा |

झेला है जिसने पल-पल गरीबी

सुन ले ऐ दुनिया मेरी दास्ताँ|

जब तपती है संपूर्ण धरती

जल जाते है कई पौधे ,

अपनी झोपड़ियों की सीमा लांघकर

हमने बहाये लहू के पसीने |

कॅपकॅपाती है दुनिया सारी

जब जाड़े के कड़े ठण्ड से,

धरती के साथ भीगा रहता

हमारा बदन भी पसीनो से |

झेला है हमने सब हँस कर

हर आंधी और तूफ़ान |

हम है ईमानदार अपने कार्य के प्रति

मिलता है हमे दो वक़्त की रोटी का वरदान |

जहाँ एक ओर अचंभित होते लोग

इमारतों की ऊंचाइयां देख कर |

हमने तो सिर से पाँव तक बनाया

नीचे अपनी धरती देख कर |

निभाया सदा अपना कर्तव्य

किया सदा एक आसमान- ज़मीन,

पर ताज़महल के लिए है शाहजहां की पहचान

हमारा तो दूर तक नाम नहीं |

 समझते है लोग हमे कम

आरम्भ से ही करते है घृणा ,

पर अगर न होते हम

तो विज्ञान और जीवन ही रहता अधूरा |

 मैंने और मेरे भाइयों ने

देखा है मौत को करीब से,

एक छोटी सी चूक भी

ले आती है जीवन खतरे में |

जिसके हर एक कदम पर

मंडराती है मौत सदा |

मैं हूँ एक मज़दूर

जिसकी है अनोखी गाथा |

एक नन्हे की जंग

वर्ष 2006 कुरुक्षेत्र में घटित एक घटना पर रचित यह कविता, जिसमे प्रिंस नामक 5 साल का बालक 60 फ़ीट नीचे एक बोरवेल में गिर गया था  |
                                                                                                                                                                  (बोकारो , अगस्त 2006)

 

पांच बरस का मैं था बच्चा

गिर पड़ा गहराई में |

दुनिया से तो दूर था बेहद

गहरी नीची खाई में ||

अंधियारों में ठिठका जीवन

साहस ना मैंने खोया |

आस पाले था मेरा मन

संकट में ना मैं रोया ||

   …

घुटती तो सब साँसें मेरी

था सुख चैन का खोना |

क्यूँ डरूँ मैं क्षणिक रात से

तय है जब प्रात का होना ||

 …

न थी वहाँ माँ की गोद

न पिता का सहारा था |

तड़प तड़प कर रह जाता था

मैं अकेला बेचारा था ||

   …

आखों में थे कई सपने

पर ज़िंदगी में थी ख़ामोशी |

कब पहुँचूंगा ऊंचाइयों पर

देखूंगा दुनिया सारी ||

    …

जब आयी ऊंचाइयों से उम्मीद

तब आयी साँसों में साँस |

समझ गया था मैंने तब ही

मिट जाएगी मेरी भूख और प्यास ||

    …

धरती की गोद से उठ कर

पा लिया मैंने माँ की गोद |

हुआ मेरा एक नया जन्म

आँखों में आ गए मोती के ओस ||

    …

शायद ईश्वर ने सुन ली

मेरी करुणामयी पुकार |

तम से प्रकाश की ओर

देख लिया मैंने संसार ||

    …

ख़ुशी से मैं झूम उठा

जब पाया लोगों से इतना प्यार |

साहस और दुआओं से

कर लिया ये कठिनाई पार ||